Friday, April 8, 2011

स्व कुमार गंधर्व की कालजयी कृति। लिंक पर क्लिक कीजिये। http://www।youtube।com/watch?v=_buuncAm9Ts

Wednesday, September 1, 2010



['कादम्बिनी' मार्च २०१० में प्रकाशित एक पठनीय लेख]



Sunday, August 15, 2010

शिकार पर झपटने
के पहले की ख़ामोशी

और शिकार के बाद
का सन्नाटा

एक नहीं हैं


- पद्मनाभ तिवारी
उसके बगल से गुजरते हुए
मैंने गहरी साँस ली
और उसके अनजाने
उसकी गंध को
अपने में क़ैद कर लिया

इसे कहते हैं
प्रेम के पल चुराना


- पद्मनाभ तिवारी
जब मेरा शरीर निस्पंद पड़ा होगा
और मैं उसे देख रहा होऊँगा

जब करने को कुछ नहीं
और चाहने को बहुत कुछ बचा होगा

तब, वह क्षण कैसे ख़त्म होगा


- पद्मनाभ तिवारी

Tuesday, July 13, 2010

भोपाल गैस विभीषिका का सार-संक्षेप कवि राजेन्द्र अनुरागी की ये पंक्तियाँ बयाँ करती हैं -

कहीं ये आज़माइश तो नहीं थी इस ज़हर के लिए,
कि कितनी गैस काफी होती है एक शहर के लिए.