Tuesday, July 13, 2010

भोपाल गैस विभीषिका का सार-संक्षेप कवि राजेन्द्र अनुरागी की ये पंक्तियाँ बयाँ करती हैं -

कहीं ये आज़माइश तो नहीं थी इस ज़हर के लिए,
कि कितनी गैस काफी होती है एक शहर के लिए.

Monday, March 8, 2010

कविता ५

जो युवा हैं
वे उतने जीवित नहीं हैं
जो वृद्ध हैं
वे उतने मृत नहीं हैं
जो मृत हैं
वे उतने अनुपस्थित नहीं हैं
जो भविष्य हैं
वे उतने असंगत नहीं हैं
जो वर्तमान हैं
वे उतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं


– पद्मनाभ तिवारी

Sunday, March 7, 2010

कविता ४

उम्र नहीं
ज़िन्दगी
आदमी को बूढ़ा बनाती है

– पद्मनाभ तिवारी

कविता ३

और
जहाँ तुम खड़ी थीं
ज़मीन अब भी मुलायम है

– पद्मनाभ तिवारी

Sunday, February 21, 2010

कविता २


कितना कुछ हो रहा होगा
और मैं मर जाऊँगा

नए-नए मॉडल्स आएँगे
कारों कम्प्यूटरों और फ़ोनों के
रियल इस्टेट और भी मुनाफ़े का
धंधा हो जाएगा
शेयर बाज़ार छुएगा
रिकॉर्ड ऊँचाइयाँ और नीचाइयाँ
मॉल्स और भी सुन्दर कोमल
और क्रूर हो जाएँगे
धूप चिड़िया मिट्टी नदी
और दूर हो जाएँगे
इतना सब हो रहा होगा
और मैं मर जाऊँगा

अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो जाएगा
शिक्षा का
हिंसा करार दिया जाएगा
देखना या दिखाना
ग़रीबी भूख या भिक्षा का

सब अहिंसक हो जाएँगे
पवित्र ईमानदार और सुन्दर हो जाएँगे
टी. वी. पर "संगीत" के "महायोद्धा" छा जाएँगे
हँसने के लिए योगासन करवाए जाएँगे
पर शोक
मैं मर जाऊँगा

और भी तर्क खोज लिए जाएँगे
लोग भी मुतमइन हो जाएँगे
कि क्यों उचित है
मँहगी उच्च शिक्षा
कि क्यों ज़रूरी है
हमारी भाषाओं की हत्या
क्रिकेटवाले फ़िल्मवाले और बाज़ारवाले
हमारे नायक हो जाएँगे
जिनके लिए दो ही समस्याएँ रह जाएँगी
बीमारियों में एड्स
और इन्सानों में सेक्स-वर्कर
सत्य की ऐसी-ऐसी खोजें हो रही होंगी
और मैं मर जाऊँगा



– पद्मनाभ तिवारी

अचानक मुलाकात

अरे कहिए ! नमस्कार मित्र !
मिले कई बरस बाद मित्र

वाह ! आप मय कार, और
तन का गोलक आकार मित्र

जीपों पर लदे समर्थक ये
करते हैं जय-जयकार मित्र

गठे बदन के अनुयायी
खोंसे कितने हथियार मित्र

एक काम छोटा-सा है
सोचा बोलूँ कई बार मित्र

उसको साले को उठवा लें
होगा मुझ पर उपकार मित्र

– पद्मनाभ तिवारी